उस्ताद जी (Ustad Ji)
एक पुलिस वाले की यादों में बसा उस्ताद जी का वह घर, जहाँ संगीत की धुनों और घरेलू झगड़ों के बीच ज़िंदगी के कई रंग छिपे थे।
“ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं”
- कृष्ण बिहारी नूर
मैं पुरानी हवेली के इलाके में ही पला बढ़ा था। इलाका बड़ा मरग़ूब था। चारों तरफ हरियाली रहती थी। हर मौसम पिछले वाले से खूबसूरत होता था और हर गली अगली गली से सुंदर। इसी इलाके में एक घर उस्ताद जी का था। उस्ताद जी के घर में वो और उनकी मंडली रहती थी। जब मैं छोटा था तो एक उस्तानी जी भी थी। उस घर में दिन भर गाना बजाना चलता रहता था और नतीजतन हमें हमेशा से ही उनसे दूर रहने की नसीहत दी गई। जब जवान हुए तो दोस्त यार जमा होके कई मर्तबा पहुँच जाते थे उस्ताद जी की मंडली के सामने और बैठ जाते थे संगीत के सामने नतमस्तक।
उस्ताद जी की आवाज़ बड़ी दिलकश थी। हम बेचारे मौसिकी तो क्या समझते थे.. मगर उनकी मीठी आवाज़ जब जब गमक को मुड़ती तब तब दिल में वलवले-से जगा देती थी और यूं लगता था के जीवन सफल हुआ। पर उनकी आवाज़ से भी दिलकश मुझे मालूम होते थे उनके गीतों के बोल।
“कागा नैन निकाल ल्यों ले जाओ परदेस पहले दरश कराई के फिर ली ज्यों तुम खाई रे”
शेर पूरा होता के समाईन कह उठते, “वाह वाह! वाह वाह!” हम लोग भी अपने अपने छोटे-मोटे प्यार को याद कर लेते थे और बड़े खुश हो जाते थे। शराब पीके संगीत सुनने में जो आनंद था वो तो पूछिए ही मत। पुलिस की वर्दी जब डाल लिये तो सबसे पहली पोस्टिंग अपने ही इलाके में करवा लिए। इसका भी एक कारण तो था ही “दरश”। खैर, जब पहली बार ड्यूटी पर लगे, काम वगेरा शुरू किया तो समय बड़े आराम से निकला। छोटा मोटा काग़जी काम रहता था बस, बाकी कुछ नहीं। उस समय मुझे ‘पुलिस’ वाले कामों से दूर ही रखा जाता था।
एक बार एक नाटा-सा आदमी भागे भागे स्टेशन आया था। बड़ा परेशान लग रहा था। तैनात कांस्टेबल की तरफ मुड़के बोला, “भाईसाब, ये नशेड़ी तो अब जाणे का नाम ही ना ले रहा, भाई साब, आप ही चलके कुछ करो।” भाईसाब उस समय काल पर व्यस्त थे, मेरी तरफ मुड़के इशारतन बोले, “इसे संभाल।” मैं बड़ा खुश हुआ और भागके आया, “कहो क्या परेशानी है” “अरे जो घर में हम रहते हैं, उसके पास वाला घर पड़ा है बंजर, खाली। अब दो चार नशेड़ी वहाँ मिलके बैठने लगे हैं और जब देखो शोर हो-हल्ला शोर। कुछ करिए भाई साब” “चल फिर, मैं देखता हूँ।”
अपना डंडा उठाया और उसीकी मोटरसाइकिल के पीछे बैठके मैं पहुँच गया उसके मोहल्ले। अपने इलाके से दूर रहे हुए बस सात-आठ साल ही हुए थे लेकिन सब कुछ एकदम ही अलग लगने लगा था। पूरा हुलिया ही बदल चुका था। ऐसा लगता था के इस जगह को बस सपने में देखा हो। कभी इन्हीं गली-गलियानों में घूमते फिरते थे। खैर, दो-तीन सकड़ी-सकड़ी सी गलियों में इधर- उधर घूमके हम ‘भाई साब’ के घर पहुंचे। पहले उसने मुझे चाय-नाश्ता पूछा, मैंने कहा जी नहीं। मैं घर पहचान चुका था। उस्ताद का घर।
समय के साथ धीरे-धीरे हमारा उस्ताद के यहाँ जाना कम होने लगा। समाईनों का जमावड़ा ही कम होने लगा। उस्ताद और उस्तानी के बीच झगड़े होने लगे। जब भी वहाँ जाते थे संगीत का माधुर्य कम और घरेलू झगड़ों का शोर-गुल ज़्यादा नसीब होता था। तब तक फोन भी मिल गया था। अब ऐसे में संगीत कितना भी मीठा हो, कौन सुने? ज़िंदगी में और लज़ीज़ चीज़ें थी। घर के बाहर खड़े खड़े बस यहीं सब याद आ रहा था के मर गया होगा उस्ताद भी। पता नहीं काका कब मरेगा।
हर कोई मर ही जाता है, कभी न कभी वो भी मर ही जाएगा, ऐसा सोचकर मैं खुद को तसल्ली दे देता था। सोचने लगा था के उस्तानी का क्या हुआ होगा, उसकी तो उम्र उस्ताद जितनी थी नहीं। कहां रहती होगी वो अब? जिस घर के लिए इतना झगड़ा हुआ, आखिर बिक ही गया। बस इतना सोच ही रहा था के पड़ोस से सुर उठा, “वाह वाह! वाह वाह!” उस्ताद अभी जीवित था, और नशेड़ी का रूप धारण करके आज भी इन गलियारों को परेशान कर रहा था। गजब है।
“मैं जाता हूँ। आप चलिए अंदर।”
“नहीं नहीं, भाई साब! हमारी मदद लगेगी, आइए हम भी चले आपके साथ”
घर सिर्फ फरियादी भाई साब का ही था। ये पास में जो था उसे तो खंडहर भी कहा जाता तो तारीफ होती। ढेर था, कचरे का। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं। दो-तीन बार खटखटाया।
“तोड़के घुस जाओ, भाई साब।”
भाई साब बड़े उत्सुक आदमी थे। खैर, मैं चिल्लाया, “उस्ताद जी! मैं हूँ!” “कुण?” “मैं! अरे आप.. नूर बुलाते थे साब मुझे!” “नूर? हवेली वाला नूर?” “जी, उस्ताद जी, वहीं!” दो-पाँच मिनट सन्नाटा रहा और फिर किवाड़ खुले।
“उस्ताद जी पुलिस!”
“राम-राम उस्ताद जी”, बड़े समय बाद उन्हें देखके हाथ तो खुद-ब-खुद ही जुड़ गए। उनके मुँह में बीड़ी थी, कश खतम हुआ तो हाथ जोड़कर वो भी बोले, “राम-राम! राम-राम! आओ बैठो। पानी लोगे?” मैंने मुँह झुकाके हामी भरी और थोड़ी सी ब्रांडी मेरी तरफ खिसका दी गई। तब उनकी नजरें, जो के कंकाल के छेद में धस चुकी थी और अंधेर गुप रात में मोती सी चमक रही थी, भाई साब पर पड़ी।
“कहो, यहाँ कैसे आना हुआ?” “दरश”
सन्नाटा। दो-चार मिनट किसीने कुछ नहीं बोला तो उस्ताद जी ने हारमोनियम पकड़ लिया और फिर शुरू हो गए, “सकल हंस में रामे विराजे” मौसिकी को बीच में काटना अच्छा तो नहीं लगा पर काटके मैंने कहा, “अच्छा उस्ताद जी, बाकी मंडली किधर?” उस्ताद जी रुके। उन्होंने अपनी यमराज के प्रताप को मुनाकिस करती हुई आँखों से मुझे घूरा, फिर एक ओर देखा। जिस आदमी ने किवाड़ खोला था वो तबला वादक था। जिसने ब्रांडी पकड़ाई वो बाँसुरी बजाता था। मैंने बोला, “उस्ताद जी लेकिन तानपूरा..?” उस्ताद जी ने अपनी गरदन, जो के अकड़ चुकी थी, बड़ी मशक्कत से ऊपर उठाई और यमराज के अक्स को तारों में बिखेर दिया। मैं समझ गया के उनका अब देहांत हो चुका।
उस्ताद जी ने तब अपने पास पड़ी बोटल उठाई और एक लंबा घूंट लेके बोले, “तुम बताओ, नूर बाबू। वेदिका कैसी है? दिखी नहीं बड़ा टेम हुआ।” मैं समझ गया अपने पुराने साथी की असमय याद दिलाने के बदले उन्होंने भी मेरे दिल पे वार किया था। “मालूम नहीं, उस्ताद जी। बहुत टेम तो मुझे भी हुआ देखे।” उस्ताद जी तीखी हंसी हस दिए और बोटल मेरी तरफ खिसकाके बोले, “आशिक़ी हो के बंदगी फ़ाकिर-”
“उस्तानी जी कहां हैं?” मैंने टोककर कहा। उस्ताद जी की आँखें फिर आसमान से नीचे उतरी और भाई साब पे पड़ी, “मालूम नहीं।” फिर सन्नाटा। मैं उठ खड़ा हुआ और बोलने लगा “देखिए उस्ताद जी, सुनने में आता है आप नशे में हो-हल्ला करने लगे हैँ”, मैं भाई साब की ओर मुड़ा, वे चिढ़न से भर चुके थे, “मैं बस यहीं कहूँगा के.. के..”
“के चले जाओ इधर से, मर जाओ कहीं जाके। कब तक जिन की तरह पीछा करोगे?”, उस्तानी की तीखी आवाज मुझे पीछे से सुनाई पड़ी। लगता है इस इलाके में लोग मरते ही नहीं, हमेशा ज़िंदा रहते हैं।