कुछ है कर जाना!

संघर्ष, टूटे सपनों और फिर से उठ खड़े होने की हिम्मत पर आधारित यह कविता हर मुसाफ़िर को उम्मीद, साहस और नई शुरुआत का संदेश देती है।

Abhijeet

कुछ है कर जाना!

सपनो के मोतियों को सोच के धागे में पिरोय हुए चल दिए थे तुम मुसाफिर अपने ही धुन में खोय हुए ना रास्ते का पता था ना मुसीबतों का ठिकाना हा पर ठाना था तुमने की कुछ है कर जाना कुछ है कर जाना!!!

हौसले बुलंद, बस यही तो था तेरा एक हथियार लड़, आ पाले मुझे यही तो थी तेरे लक्ष्य की इक पुकार मैं जानता हूँ कि ये तेरा महज एक ख्वाब नहीं इसके लिए दिन बीते कितने रात जगे कितने इसका हिसाब नहीं!!!

जब रास्तों ने जानबूझकर अंगारे बिछाई थी तब तूने भी क्या हुंकारे लगाई थी तूने भी अपने ख्वाब को कई रंगों से सजाया था हा मैं जानता हूँ मेरे दोस्त कि तूने भी हवा की जमीं पर धुएं का महल बनाया था!!!

हा समझता हूँ कैसा लगता है जिंदगी से हारकर जिस चीज को चाहा सबसे ज्यादा वो ना मिली ये जानकर पर तू ये ना देख की तूने क्या खोया है तूने तो सबसे ज़रूरी अपनी वास्तविकता और पहचान को पाया है!!!

तू मंजिल के रास्ते पर क्या निडर होकर लड़ा था हौसले के लाठी के सहारे हिमालय के सामने शीश उठाए खड़ा था उसी वक्त तूने सच्ची सफलता को पा लिया था घमंडी आसमां को भी पाँव तले झुका दिया था!!!

अब चल फिर उठ जा, कूजकर लक्ष्य को ठान जिंदगी तो झकझोरती है तू हार ना मान बता दें जिंदगी को तुझे रोक दे इतना उसमें ज़ोर नहीं हारा उससे क्योंकि मजबूर था तू कमजोर नहीं!!!

गिरकर उठना ही जीवन है ये तू जान ले मालिक है तू अपने किस्मत का ये तू मान ले उठकर ताकत से तू जिंदगी से फिर लड़ जा ठान ले मन में और फिर कुछ कर जा, फिर कुछ कर जा!!!