वेदना का नाद

A Hindi poem expressing deep inner sorrow under the beauty of a full moon night.

Anubhav Srivastava

वेदना का नाद
वह पूर्णिमा की रात थी,
वह पूर्णिमा का चाँद था।
बजता हृदय के तार से,
कुछ वेदना का नाद था।

स्वच्छ चाँदनी से सज्जित,
शीतल था सिन्धु -किनारा।
जीवन के निराश पथ पर,
छाया गहरा अँधियारा।

लहरों का निश्चल नर्तन,
बहता था पवन मलय का।
मानस-सिन्धु के सतह पर,
उठता था ज्वार प्रलय का।

पुष्पों का मधुमय सरगम ,
गूँजे जो सुरमय धारा;
हर्षित कैसे हों इससे ?
मूर्छित था चित्त हमारा।

विशाल वृक्ष के तृप्त पर्ण,
हैं पहनें ओस की माला।
श्रांत अश्रु की बूंदों ने,
भर डाला उर का प्याला।

वह पूर्णिमा की रात की,
वह पूर्णिमा का चाँद था।
बजता हृदय के तार से,
कुछ वेदना का नाद था।