मौत तू एक कविता है
ज़िंदगी एक अधूरी किताब है जिसका आखिरी सबक है मौत। एक पुलिसवाले की डायरी और जेल की दीवारों पर उकेरी गई वो शायरी, जो मरकर भी ज़िंदा रही।
“मौत तू एक कविता है”
- गुलज़ार
मौत के बारे में अब बहुत सोचने लगा हूँ। मौत से कई ज़्यादा सोचने लगा हूँ ज़िंदगी के बारे में। ज़िंदगी और मौत के बारे में अलग-अलग सोच भी कैसे सकता हूँ। ज़िंदगी एक किताब है जिसका आखिरी सबक है मौत। बिना मौत देखे ज़िंदगी को समझना नामुमकिन है। चाहे इल्म कितना भी आला हो, बिना आखिरी सबक के होता है अधूरा, कच्चा, अर्थहीन। मौत किसी वेब सीरीज (web series) का वो आखिरी सीज़न है जो उसे या तो ऐतिहासिक घोषित करता है या उसे हमेशा-हमेशा के लिए सिनेमा पर लांछन बना देता है।
अब मेरी भी मौत का वक़्त हुआ जाता है। मैंने हमेशा सोचा है के मौत जब आएगी तो बाहें पसारे मैं उसका इंतेज़ार कर रहा होऊँगा। वो मेरे पास आकर, मेरी बाहों से लिपटकर, मुझे ज़ीस्त के इन अफ़सुर्दा हालातों से आज़ाद कर देगी। मौत के बाद ना भूख होगी ना प्यास, ना चाहत होगी ना ख्वाहिश। मुफलिसी शायद मौत के बाद भी रहेगी। मुफलिसी मेरी रूह मैं है, भूख और प्यास तो बस शरीरी है।
जब तक मेरा नाम नहीं जान लेते, आप लोग मुझे गुलज़ार बुलाए। मेरा असली नाम तो खैर आप कभी जान भी नहीं पाएंगे। मुझे नाम देने वाले नाम देते ही मर गए। ज़िंदा थे तो मरने ही थे। मेरा नाम भी उन्हीं के साथ मर गया। इसके बाद एक-दो नाम मुझे दिए तो गए हैं मगर व्हाट्स इन ए नेम (What’s in a name?)? गुलज़ार आप मुझे इसलिए बुला सकते हैं के उसकी शायरी को मौत नहीं आती, जैसे मुझको नहीं आती।
मरने के मुझे ज़िंदगी में कई मौके मिले हैं। ये तब की बात है जब मैं नया-नया पुलिस-वाला हुआ था। पुलिस-वाला बनने का मुझे कोई खास शौक था नहीं। जो मुजरिम मेरे सामने खड़ा था उसका भी मुजरिम होने का कोई खास शौक मालूम नहीं होता था। उन दिनों मुझे मौत से कोई खास त’अल्लुक नहीं था, लेकिन इस मुजरिम की मौत उसकी आँखों में आँखें डालके खड़ी थी और गले लगने को तैयार ही थी। आज उस मुजरिम की बड़ी याद आती है।
मैंने अपने काका से कहा था, “कितनी भी रकम भरके नौकरी लगवा दो, मैं नौकरी नहीं करूंगा। भीख मांग लूँगा लेकिन करूंगा वहीं जो मैं चाहता हूँ।” मुजरिम की आँखों से अक्स-ए-मौत मुझे घूर रहा था। वो बोला, “कितनी भी मार, मैं मुँह नहीं खोलूँगा।” इस मुजरिम ने तत्कालीन मुख्य मंत्री के काफिले की आखिरी गाड़ी में बम रखके उड़ाया था। कहता था ‘प्रोटेस्ट’ किया है। ‘प्रोटेस्ट’। मैंने काका को कहा, “मैं हरगिज़ नहीं जा रहा। नहीं देंगे नौकरी तो ना दे। मुझे चाहिए भी नहीं।”
“चुप, भड़वे।”
उन दिनों मुझे किताबें पढ़ने का बड़ा शौक था। अब भी है। मुजरिम को भी था। वो रोज़ मुझे कहता था, “एक नोटबुक, साहब! बस एक नोटबुक दे दो.. कसम से और कोई ‘प्रोटेस्ट’ नहीं करूंगा।” मौत ने अपने हाथ पसार दिए थे और गले लगने को तैयार खड़ी थी लेकिन ये आदमी ऐसे सिकुड़के बैठा था जैसे इसकी ज़िंदगी बड़ी प्यारी चीज़ हो। मैं क्या जानता नहीं था इसे नोटबुक क्यों चाहिए ? ‘प्रोटेस्ट’ करने के लिए नोटबुक क्या कम हथियार है? नोटबुक के होते हमारे सामने ‘प्रोटेस्ट’ करने की तो ज़रूरत ही नहीं है, सब नोटबुक में कर लिया जाएगा।
“तो तुम नहीं बताओगे तुम्हारे साथ इस आतंकी साज़िश में कौन-कौन शामिल था?”
“जी नहीं”
“अपना जुर्म कुबूलोगे भी नहीं?”
“जी नहीं”
“मारे जाओगे”
“जी हाँ”
“मरने का शौक है?”
“वतन हमारा रहे शादकाम और आज़ाद, हमारा क्या है अगर हम रहे, रहे ना रहे”
अश्फ़ाक़। लिखने वालों के फ़न से अक्सर ही मुतहय्यर हो जाता हूँ। लिखने वाले की मौत के इतने बरस बाद भी देखो, एक आदमी उसका शेर पढ़ते-पढ़ते मर जाने को तैयार है। मैंने उसे कहा, “देखो, वो समय गया जब इस तरह के ‘प्रोटेस्ट’ दायर होते थे। अब तुम आतंकवादी हो।” उसने जवाब दिया, “तब भी था।”
जब मेरे काका ने मुझसे पूछा, “क्या करना चाहते हो?” मैं यहीं कह सका के “कुछ लिखना चाहता हूँ।” मैंने कभी कुछ काबिल-ए-तवज्जो नहीं लिखा। लिखने के अलावा मगर बहुत कुछ किया। ये मुजरिम भी लिखा करता था। दिन भर रोता रहता था, कहता था, “नोटबुक नहीं मिली तो मर जाऊंगा। मेरी मौत मेरा आखिरी ‘प्रोटेस्ट’ होगी।”
हमने उसे खाना देना छोड़ दिया, हड्डियाँ तोड़ दीं उसकी, गरम खौलता तेल उस पर उंडेल देते थे। वो बस “नोटबुक, नोटबुक” चिल्लाता रहा। एक दिन मर गया। अंदर जाकर देखा तो उसी दिन उसके जींद की दीवारों पर लिखने की जगह खत्म हो गई थी। चारों दीवारें भर चुकी थी शेर-ओ-शायरी से। छत नहीं भर सका तो मर गया। हम उसे रोज़ कहते थे, “कुत्ते की मौत मरेगा तू। ना कोई तुझे पूछेगा, ना कोई लाश उठाने वाला होगा। मर जाएगा यहाँ बंद जेल में भूँकते भूँकते।”
मेरे पास जीने को अब एक-दो महीने बचे हैं। ज़िंदगी में पहली बार मैं कुछ लिख रहा हूँ। अब नहीं लिखा तो मर… मर तो जाऊंगा ही, लिखूँ ना लिखूँ। लिखता हूँ क्योंकि लिखने का सपना बड़े बचपन में देखा था। मौत मेरी तरफ बढ़ने लगी है और जैसे-जैसे पास आती है, बचपन की बड़ी याद आती है। याद आती है उस बात की भी जो वो मुजरिम मुझसे कहता था।
याद मुझे अपनी पूरी ज़िंदगी की ही आती है। काका ने मुझे कहा, “देख ले, कुत्ते की ज़िंदगी जिएगा, कुत्ते की मौत मरेगा। कोई नहीं पूछेगा तुझे। भूँकता रहेगा। कितने लोग लिख-लिखके मर गए। तू भी मर जाएगा।” जब मेरे काका मरे तो उनकी लाश उठाने मुझे बुलाया गया। मैंने कहा, “भौ! भौ!” पता नहीं क्या हुआ उनकी लाश के साथ। मेरी लाश के साथ क्या हुआ, मैं जानता हूँ।
मैं बना कुत्ता। जंगली-आवारा-बेतहज़ीब कुत्ता नहीं, मैं बना मोदब, पालतू कुत्ता। बड़ी लंबी ज़िंदगी रही है जो अब नोटबुक पे उतारने बैठा हूँ। यहीं है मेरा कुत्ता होने के खिलाफ आखिरी ‘प्रोटेस्ट’- मेरा आत्मचरित्र। वो मुजरिम अचानक से पागल-सा हो जाता, रो रहा होता तो हंसने लगता, हंस रहा होता तो रोने। पता ही नहीं चलता था के ग़मगीं है या पुर-मुसर्रत। वो हमारा मज़ाक उड़ाता था। कहता था-
“सब के सब कुत्ते की मौत मरेंगे। इसमें कोई मेटाफोर या कोई एक्सैजरेशन थोड़े है। हम कुत्ते की मौत मरेंगे। तुम जो जरदा भरके पान खा रहे हो तुम भी और वो जो ज़िंदा आदमी का खून पी जा रहे है वो भी। ज़िंदगी चाहे किसी की कैसे भी कटे, मौत हर किसी को मिलेगी कुत्ते की। चाहे ज़िंदगी भर भूखे रहे चाहे तंदुरुस्त, चाहे हज़ारों करोड़ों के मालिक हो चाहे भीख पे पले, चाहे कब्र मिले या नहीं, चाहे लाश को जलाया जाए या मोम में लपेट कर आने वाली नस्लों के सामने शो-पीस बना दिया जाए- मौत के बाद क्या है? ये बात तुम चाहे अभी समझो या नहीं लेकिन जिस दिन तुम्हारी मौत तुम्हारे सामने होगी देख लेना। ज़िंदगी भर तुम्हारे दिमाग में चाहे अपने भगवान का खयाल रहा हो चाहे अपने बच्चे का, चाहे देशप्रेम का या चाहे सेक्स का- मौत के पहले पल में तुम सब को यकायक यहीं एक खयाल चुभेगा। मरने के जस्ट पहले, जीवन के खत्म होने के अल्तमस इंतेज़ार में तुमको ये दिखेगा के तुम्हारी मौत कुत्ते की मौत थी। कुत्ते की।”
“साला कम से कम प्यार करके मरूँगा।”