कलाम-ए-रफ़्ता

एक माँ की ममता और एक रूह की पुकार। मौत ने जिस्म तो मिट्टी में मिला दिया, पर क्या वो उन यादों को मिटा पाएगी जो आज भी कहकशाओं के बीच ज़िंदा हैं?

Jahin Sadat Mollah

कलाम-ए-रफ़्ता
मुद्दतों बाद आज आई है अंत-ए-बेगहरी
बन चुका है मेरा घर, आई है खुशियों की घड़ी

छोटा है मेरा यह मकान नया
इसी में मगर मैंने राहत है पाया
हर कोई जो इसे देखे रह जाए बेज़बान
कहाँ उन्हें मगर क्या पता, यही जो अब बन चुकी मेरी इकलौती पहचान

आया है मेरी ज़िंदगी में खुशियों का मौसम
होता है अब मुझको यह एहसास
कि मिट जाएँगे मेरे सारे ग़म

अफ़सोस पर यही है
कि यही हक़ीक़त-ए-ज़िंदगी है
हयात ने छीन लिया मेरे इस मकान में रहने का मौक़ा
है वह मौत ही एक
मीठी नींद दिलाई है उसने
मेरे इस छोटे से मकान में

अजीब हूँ मैं अहल-ए-दुनिया की नज़रों में
समझते हैं अक़्ल-ए-नादान वह मुझे
फिर भी वही हैं जिन्होंने दिया
मेरे छोटे से मकान को एक प्यारा सा नाम
पुकारते हैं लोग मेरे इस छोटे से घर को "क़बर"
यही है दुनिया की नज़रों में उसका नाम
यही है उसकी पहचान

बे-ग़म हूँ आज मैं
मौत ने सारे दुख मिटा दिए मेरे
पर आज भी मैं देखता हूँ सैकड़ों कहकशाओं की दूरी से
किसी की आँखें नम हैं आज भी मेरी यादों में
किसी के रोने की आवाज़ आती है आज भी मेरे कानों में
वह मेरी माँ है

अहल-ए-दुनिया के लिए मैं कब का मर चुका
मेरी माँ की यादों में लेकिन मैं हूँ आज भी ज़िंदा
ऐ मेरी माँ, नम न कर तेरी यह रोशन चश्म
हूँ मैं तुराब-ए-जान-ओ-जिस्म
ज़मीन की पैदाइश हूँ मैं
उसी ज़मीन में आज लौट रहा हूँ मैं

माना कि मेरा जिस्म नहीं होगा अहल-ए-दुनिया के बीच और
मेरी रूह पर रहेगी इसी दुनिया के हर कोने पे
तू मुझे पाएगी आसमान की हर कहकशाओं के बीच
मुझे पाएगी हर ज़मीन के गुल-ए-फ़िरदौस के बीच
हर बच्चे की आँखों की मासूमियत में
ग़म-ए-दिल न कर
मैं अब भी हूँ तेरे ही साथ